उत्तर प्रदेश सरकार इन दिनों हजारों सरकारी प्राइमरी और जूनियर स्कूलों को या तो बंद कर रही है या उन्हें दूसरे स्कूलों में मर्ज (विलय) कर रही है। इसका कारण और इसके पीछे की असली वजह जानिए —
छात्रों की कम संख्या (Enrollment) —
सरकार ने फैसला किया है कि जहां 50 से कम बच्चे पढ़ते हैं, उन स्कूलों को नजदीकी स्कूलों में मर्ज कर दिया जाए। नहीं तो बंद कर दिया जाएगा।
कारण — खाली स्कूलों में पढ़ाई का माहौल नहीं बन पाता और संसाधन बर्बाद होते हैं।
2018 में जहां यूपी में करीब 1.63 लाख स्कूल थे, अब ये घटकर 1.37 लाख हो चुके हैं।
संसाधनों का बेहतर उपयोग —
सरकार का कहना है कि इससे अध्यापक–छात्र अनुपात सुधरेगा और स्कूलों में बेहतर टीचिंग मिलेगी।
सरकारी खर्चे और खाली पड़ी इमारतों को भी दूसरे कामों के लिए उपयोग किया जा सकेगा।
बालवाटिका (प्री-प्राइमरी) क्लास शुरू करने में मदद मिलेगी।
नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप —
NEP 2020 के मुताबिक छोटे स्कूलों को क्लस्टर में मिलाकर कॉम्प्लेक्स बनाया जाना चाहिए ताकि बच्चों को ज्यादा विकल्प मिलें । अच्छे टीचर हर जगह उपलब्ध हों
विपक्ष और जनता की चिंता —
ग्रामीण इलाकों के बच्चों को दूर स्कूल भेजना पड़ेगा — इससे ड्रॉपआउट बढ़ने की आशंका है। लड़कियों की पढ़ाई पर खास असर हो सकता है। गरीब बच्चों के लिए ये फैसला शिक्षा से दूरी बनाने वाला हो सकता है। शिक्षकों की भर्ती पर भी असर — लगभग 1.9 लाख पद खाली हैं, फिर भी स्कूल बंद हो रहे हैं।
अदालतों का रुख —
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मर्ज करना गलत नहीं, लेकिन सरकार को यह देखना होगा कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो और स्कूल तक सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित हो।
निष्कर्ष—
👉 सरकार का मानना है — इससे शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी।
👉 विपक्ष और शिक्षाविद कहते हैं — इससे गरीब, गांव और वंचित वर्ग के बच्चों की पढ़ाई बंद हो जाएगी।
👉 यह मुद्दा अब राजनीतिक बहस और कोर्ट के दायरे में भी पहुंच चुका है।